“रंग, उमंग और सफलता: SAGA 2025 का शानदार समापन”
कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय के अंग्रेजी विभाग द्वारा आयोजित वार्षिक साहित्य उत्सव ‘सागा 2025’ के दूसरे दिन की शुरुआत छात्रा ख्याति द्वारा ऊर्जावान उद्घाटन के साथ हुई, जिसमें उन्होंने दिनभर के कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत की। इसके पश्चात ‘विज़ाज ऑफ मिथिकल म्यूज़ेसः फेबल्स अक्रॉस फेसेज़’ फेस पेंटिंग प्रतियोगिता तथा ‘मोज़ेक ऑफ हिस्टोरिकल टेल्स’ पुस्तक आवरण डिज़ाइन प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिनमें प्रतिभागियों ने लोककथाओं से प्रेरित रचनात्मक प्रस्तुतियाँ दीं। फेस पेंटिंग प्रतियोगिता में तान्या परमान (कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय) ने प्रथम, अंशुल डागोदिया (महाराजा कॉलेज) ने द्वितीय तथा सुरभि वर्मा ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। वहीं पुस्तक आवरण डिज़ाइन प्रतियोगिता में मंतशा कपूर (कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय) ने प्रथम, यशराज यादव (राजस्थान कॉलेज) ने द्वितीय तथा आदित्य परमार (राजस्थान कॉलेज) ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। इसके साथ ही ‘द रस्टिक रिडल्स ऑफ रिवर्बरेटिंग लोर्स’ क्विज़ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमें महारानी कॉलेज ने प्रथम, कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय ने द्वितीय एवं महाराजा कॉलेज ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। इसी दौरान आयोजित साहित्य-आधारित ट्रेज़र हंट में कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय की टीम (परख मोतियानी, विशाखा दास, मनस्वी गुप्ता एवं वंशिका शर्मा) ने ‘अरबियन नाइट्स’ थीम पर विजय प्राप्त की। द्वितीय दिवस का समापन वैलेडिक्टरी सत्र के साथ हुआ। सर्वप्रथम प्राचार्य महोदया डॉ. सीमा अग्रवाल द्वारा स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत किया गया। महाविद्यालय अंग्रेज़ी ऑनर्स षष्ठम सेमेस्टर की छात्रा अदीबा गुचिया ने दो दिवसीय उत्सव की संकलित रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके उपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार श्री नंद भारद्वाज ने राजस्थान विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापिका डॉ. अंशु वर्मा (संगीत विभाग) के साथ संवाद किया। संवाद के दौरान श्री भारद्वाज ने इस बात पर प्रकाश डाला कि लेखक केवल अपने व्यक्तिगत अनुभव ही नहीं, बल्कि समाज और परिवेश से प्राप्त सामूहिक अनुभवों को भी अभिव्यक्त करता है। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल लिखित शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक सशक्त माध्यम है। उन्होंने लोक साहित्य की सांस्कृतिक गहराई, उसकी जीवंतता और मौखिक परंपरा की व्यापकता पर विशेष बल देते हुए बताया कि ज्ञान निरंतर विकसित होता है और कहानियों व अनुभवों के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है। साथ ही डॉ. वर्मा ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि लोक साहित्य में मानवीय मूल्यों का समावेश होता है और उसमें एक शिक्षाप्रद स्वरूप निहित रहता है। अंत में महाविद्यालय निदेशक डॉ. रश्मि चतुर्वेदी ने समापन टिप्पणी प्रस्तुत की तथा उत्सव संयोजक एवं यूजी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रीति शर्मा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया। कार्यक्रम का समापन मेराकी बैंड की प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसने वहाँ उपस्थित सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह दो दिवसीय उत्सव लोककथाओं की सतत प्रासंगिकता का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा, जिसने साहित्य प्रेमियों को एक मंच पर लाकर उन्हें साहित्य की समृद्ध परंपरा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।